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दानीकुंडी की वन भूमि पर माफियाओं का कब्जा कायम, DFO ने बरसात का दिया बहाना — बोली, ‘जनप्रतिनिधियों से चर्चा के बाद होगी कार्रवाई’, क्या अब जंगल बचाने के फैसले भी मौसम और राजनीति देख कर होंगे?”

मरवाही (जिला जीपीएम)। वन विभाग द्वारा ग्राम दानीकुंडी की संरक्षित वन भूमि पर किए गए अतिक्रमण के खिलाफ 09 जून 2025 को दिए गए अंतिम नोटिस के एक माह बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो सवाल उठना लाज़मी था। इसी बीच विभाग के शीर्ष अधिकारी — वनमंडलाधिकारी (DFO) का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा:> “कार्रवाई बारिश तक के लिए टाल दी गई है। जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में है, उनसे चर्चा उपरांत ही यह निर्णय लिया गया है। कृपया झूठे दावे न करें।”

अब सवाल यह नहीं कि नोटिस दिया गया या नहीं, सवाल यह है कि —

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क्या अब अतिक्रमण पर कार्रवाई मौसम देखकर होगी?

क्या विभाग की सख्ती मानसून के मूड पर निर्भर है?

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या फिर यह समय देने की नई तकनीक है?

–⛈️ बारिश का बहाना — या माफियाओं को समय देने की रणनीति?

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वन भूमि पर कब्जा कानूनन अपराध है। विभाग स्वयं इसे मानता है, तभी 10 लोगों को अंतिम नोटिस जारी किया गया था। लेकिन अब जब विधिवत चेतावनी की 15 दिन की समयसीमा बीत गई है, तो कार्रवाई के बजाय विभाग मौसम की दुहाई दे रहा है।

इस बीच जो असली दृश्य है, वह ये है:

अवैध निर्माण जारी हैं,

मकान और चौखटें पक्की हो रही हैं,

पेड़ मारे जा रहे हैं,

और विभाग ‘बारिश के बाद देखेंगे’ का राग अलाप रहा है।

📜 कानून में बारिश की कोई छूट नहीं

भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत वन भूमि पर कब्जा और पेड़ काटना गंभीर अपराध हैं।

🌳इसमें कहीं नहीं लिखा कि “कार्रवाई सिर्फ बारिश के बाद की जाएगी”। 🌳

तो क्या विभाग कानून से ऊपर, या कानून को मौसम के हिसाब से चलाने वाला नया विभाग बन गया है?

—🧾 जनप्रतिनिधियों का सहमति-संरक्षण तर्क भी सवालों के घेरे में

डीएफओ का कहना है कि कार्रवाई जनप्रतिनिधियों के साथ चर्चा उपरांत टाली गई।

तो फिर सवाल यह है —

क्या वन विभाग स्वतंत्र नहीं, राजनीतिक सहमति पर निर्भर है?

क्या कानून अब जनप्रतिनिधियों की “मीटिंग” से लागू होगा? और अगर चर्चा में यह तय हुआ कि बारिश तक माफिया को छूट दी जाए, तो इसका मतलब क्या यह नहीं कि मौन सहमति से अतिक्रमण को वैध बनाने का रास्ता दिया जा रहा है?

⚠️ झूठे दावे कौन कर रहा है?

डीएफओ ने “false claims ना करें” कहा है।

लेकिन सच्चाई यह है:

विभाग ने स्वयं 09/06/2025 को नोटिस दिया।

15 दिन की सीमा समाप्त हो चुकी है।

मौके पर कार्रवाई शून्य है।

निर्माण कार्य जारी है।

अब जब सब कुछ दस्तावेज़ों में है, तो झूठा कौन है – सवाल पूछने वाले या चुप्पी साधने वाले?

🔚 अब वक्त जवाबदेही का है, बहानों का नहीं

बारिश सिर्फ बादलों की नहीं हो रही —

जिम्मेदारी से बचने के बहानों की भी हो रही है।

दानीकुंडी की हरियाली पर कब्जा हो रहा है, और अधिकारी इसे ‘मौसम का मामला’ कहकर टालने की साज़िश में लगे हैं।

अब जनता पूछ रही है:

बारिश के बाद कब?

कार्रवाई किस दिन तय है?

जनप्रतिनिधियों की सहमति से चलने वाला विभाग क्या वास्तव में “वन रक्षा” कर सकता है? अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि वन विभाग अब संरक्षण का नहीं, सौदेबाज़ी और समर्पण का अड्डा बन गया है।

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